आख़िरी आगाही और सलाम
11देखें, मैं बड़े बड़े हुरूफ़ के साथ अपने हाथ से आपको लिख रहा हूँ। 12यह लोग जो दुनिया के सामने इज़्ज़त हासिल करना चाहते हैं आपको ख़तना करवाने पर मजबूर करना चाहते हैं। मक़सद उनका सिर्फ़ एक ही है, कि वह उस ईज़ारसानी से बचे रहें जो तब पैदा होती है जब हम मसीह की सलीबी मौत की तालीम देते हैं। 13बात यह है कि जो अपना ख़तना कराते हैं वह ख़ुद शरीअत की पैरवी नहीं करते। तो भी यह चाहते हैं कि आप अपना ख़तना करवाएँ ताकि आपके जिस्म की हालत पर वह फ़ख़र कर सकें। 14लेकिन ख़ुदा करे कि मैं सिर्फ़ हमारे ख़ुदावंद ईसा मसीह की सलीब ही पर फ़ख़र करूँ। क्योंकि उस की सलीब से दुनिया मेरे लिए मसलूब हुई है और मैं दुनिया के लिए। 15ख़तना करवाने या न करवाने से कोई फ़रक़ नहीं पड़ता बल्कि फ़रक़ उस वक़्त पड़ता है जब अल्लाह किसी को नए सिरे से ख़लक़ करता है। 16जो भी इस उसूल पर अमल करते हैं उन्हें सलामती और रहम हासिल होता रहे, उन्हें भी और अल्लाह की क़ौम इसराईल को भी।
17आइंदा कोई मुझे तकलीफ़ न दे, क्योंकि मेरे जिस्म पर ज़ख़मों के निशान ज़ाहिर करते हैं कि मैं ईसा का ग़ुलाम हूँ।
18भाइयो, हमारे ख़ुदावंद ईसा मसीह का फ़ज़ल आपकी रूह के साथ होता रहे। आमीन।


