इमामों पर इलज़ाम

6रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “ऐ इमामो, बेटा अपने बाप का और नौकर अपने मालिक का एहतराम करता है। लेकिन मेरा एहतराम कौन करता है, गो मैं तुम्हारा बाप हूँ? मेरा ख़ौफ़ कौन मानता है, गो मैं तुम्हारा मालिक हूँ? हक़ीक़त यह है कि तुम मेरे नाम को हक़ीर जानते हो। लेकिन तुम एतराज़ करते हो, ‘हम किस तरह तेरे नाम को हक़ीर जानते हैं?’ 7इसमें कि तुम मेरी क़ुरबानगाह पर नापाक ख़ुराक रख देते हो। तुम पूछते हो, ‘हमने तुझे किस बात में नापाक किया है?’ इसमें कि तुम रब की मेज़ को क़ाबिले-तहक़ीर क़रार देते हो। 8क्योंकि गो अंधे जानवरों को क़ुरबान करना सख़्त मना है, तो भी तुम यह बात नज़रंदाज़ करके ऐसे जानवरों को क़ुरबान करते हो। लँगड़े या बीमार जानवर चढ़ाना भी ममनू है, तो भी तुम कहते हो, ‘कोई बात नहीं’ और ऐसे ही जानवरों को पेश करते हो।” रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “अगर वाक़ई इसकी कोई बात नहीं तो अपने मुल्क के गवर्नर को ऐसे जानवरों को पेश करो। क्या वह तुमसे ख़ुश होगा? क्या वह तुम्हें क़बूल करेगा? हरगिज़ नहीं! 9चुनाँचे अब अल्लाह से इलतमास करो कि हम पर मेहरबानी कर।” रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “ख़ुद सोच लो, क्या हमारे हाथों से ऐसी क़ुरबानियाँ मिलने पर अल्लाह हमें क़बूल करेगा? 10काश तुममें से कोई मेरे घर के दरवाज़ों को बंद करे ताकि मेरी क़ुरबानगाह पर बेफ़ायदा आग न लगा सको! मैं तुमसे ख़ुश नहीं, और तुम्हारे हाथों से क़ुरबानियाँ मुझे बिलकुल पसंद नहीं।” यह रब्बुल-अफ़वाज का फ़रमान है।

11रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “पूरी दुनिया में मशरिक़ से मग़रिब तक मेरा नाम अज़ीम है। हर जगह मेरे नाम को बख़ूर और पाक क़ुरबानियाँ पेश की जाती हैं। क्योंकि दीगर अक़वाम में मेरा नाम अज़ीम है। 12लेकिन तुम अपनी हरकतों से मेरे नाम की बेहुरमती करते हो। तुम कहते हो, ‘रब की मेज़ को नापाक किया जा सकता है, उस की क़ुरबानियों को हक़ीर जाना जा सकता है।’ 13तुम शिकायत करते हो, ‘हाय, यह ख़िदमत कितनी तकलीफ़देह है!’ और क़ुरबानी की आग को हिक़ारत की नज़रों से देखते हुए तेज़ करते हो। हर क़िस्म का जानवर पेश किया जाता है, ख़ाह वह ज़ख़मी, लँगड़ा या बीमार क्यों न हो।” रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “क्या मैं तुम्हारे हाथों से ऐसी क़ुरबानियाँ क़बूल कर सकता हूँ? हरगिज़ नहीं! 14उस धोकेबाज़ पर लानत जो मन्नत मानकर कहे, ‘मैं रब को अपने रेवड़ का अच्छा मेंढा क़ुरबान करूँगा’ लेकिन इसके बजाए नाक़िस जानवर पेश करे।” क्योंकि रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “मैं अज़ीम बादशाह हूँ, और अक़वाम में मेरे नाम का ख़ौफ़ माना जाता है।

1ऐ इमामो, अब मेरे फ़ैसले पर ध्यान दो!” 2रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “मेरी सुनो, पूरे दिल से मेरे नाम का एहतराम करो, वरना मैं तुम पर लानत भेजूँगा, मैं तुम्हारी बरकतों को लानतों में तबदील कर दूँगा। बल्कि मैं यह कर भी चुका हूँ, क्योंकि तुमने पूरे दिल से मेरे नाम का एहतराम नहीं किया। 3तुम्हारे चाल-चलन के सबब से मैं तुम्हारी औलाद को डाँटूँगा। मैं तुम्हारी ईद की क़ुरबानियों का गोबर तुम्हारे मुँह पर फेंक दूँगा, और तुम्हें उसके समेत बाहर फेंका जाएगा।”

4रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “तब तुम जान लोगे कि मैंने तुम पर यह फ़ैसला किया है ताकि मेरा लावी के क़बीले के साथ अहद क़ायम रहे। 5क्योंकि मैंने अहद बाँधकर लावियों से ज़िंदगी और सलामती का वादा किया था, और मैंने वादे को पूरा भी किया। उस वक़्त लावी मेरा ख़ौफ़ मानते बल्कि मेरे नाम से दहशत खाते थे। 6वह क़ाबिले-एतमाद तालीम देते थे, और उनकी ज़बान पर झूट नहीं होता था। वह सलामती से और सीधी राह पर मेरे साथ चलते थे, और बहुत-से लोग उनके बाइस गुनाह से दूर हो गए।

7इमामों का फ़र्ज़ है कि वह सहीह तालीम महफ़ूज़ रखें, और लोगों को उनसे हिदायत हासिल करनी चाहिए। क्योंकि इमाम रब्बुल-अफ़वाज का पैग़ंबर है। 8लेकिन तुम सहीह राह से हट गए हो। तुम्हारी तालीम बहुतों के लिए ठोकर का बाइस बन गई है।” रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, “तुमने लावियों के साथ मेरे अहद को ख़ाक में मिला दिया है। 9इसलिए मैंने तुम्हें तमाम क़ौम के सामने ज़लील कर दिया है, सब तुम्हें हक़ीर जानते हैं। क्योंकि तुम मेरी राहों पर नहीं रहते बल्कि तालीम देते वक़्त जानिबदारी दिखाते हो।”