3
17अपने ख़ादिम से भलाई कर ताकि मैं ज़िंदा रहूँ और तेरे कलाम के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारूँ।
18मेरी आँखों को खोल ताकि तेरी शरीअत के अजायब देखूँ।
19दुनिया में मैं परदेसी ही हूँ। अपने अहकाम मुझसे छुपाए न रख!
20मेरी जान हर वक़्त तेरी हिदायात की आरज़ू करते करते निढाल हो रही है।
21तू मग़रूरों को डाँटता है। उन पर लानत जो तेरे अहकाम से भटक जाते हैं!
22मुझे लोगों की तौहीन और तहक़ीर से रिहाई दे, क्योंकि मैं तेरे अहकाम के ताबे रहा हूँ।
23गो बुज़ुर्ग मेरे ख़िलाफ़ मनसूबे बाँधने के लिए बैठ गए हैं, तेरा ख़ादिम तेरे अहकाम में महवे-ख़याल रहता है।
24तेरे अहकाम से ही मैं लुत्फ़ उठाता हूँ, वही मेरे मुशीर हैं।


