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65ऐ रब, तूने अपने कलाम के मुताबिक़ अपने ख़ादिम से भलाई की है।
66मुझे सहीह इम्तियाज़ और इरफ़ान सिखा, क्योंकि मैं तेरे अहकाम पर ईमान रखता हूँ।
67इससे पहले कि मुझे पस्त किया गया मैं आवारा फिरता था, लेकिन अब मैं तेरे कलाम के ताबे रहता हूँ।
68तू भला है और भलाई करता है। मुझे अपने आईन सिखा!
69मग़रूरों ने झूट बोलकर मुझ पर कीचड़ उछाली है, लेकिन मैं पूरे दिल से तेरी हिदायात की फ़रमाँबरदारी करता हूँ।
70उनके दिल अकड़कर बेहिस हो गए हैं, लेकिन मैं तेरी शरीअत से लुत्फ़अंदोज़ होता हूँ।
71मेरे लिए अच्छा था कि मुझे पस्त किया गया, क्योंकि इस तरह मैंने तेरे अहकाम सीख लिए।
72जो शरीअत तेरे मुँह से सादिर हुई है वह मुझे सोने-चाँदी के हज़ारों सिक्कों से ज़्यादा पसंद है।


