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113मैं दोदिलों से नफ़रत लेकिन तेरी शरीअत से मुहब्बत करता हूँ।
114तू मेरी पनाहगाह और मेरी ढाल है, मैं तेरे कलाम के इंतज़ार में रहता हूँ।
115ऐ बदकारो, मुझसे दूर हो जाओ, क्योंकि मैं अपने ख़ुदा के अहकाम से लिपटा रहूँगा।
116अपने फ़रमान के मुताबिक़ मुझे सँभाल ताकि ज़िंदा रहूँ। मेरी आस टूटने न दे ताकि शरमिंदा न हो जाऊँ।
117मेरा सहारा बन ताकि बचकर हर वक़्त तेरे आईन का लिहाज़ रखूँ।
118तू उन सबको रद्द करता है जो तेरे अहकाम से भटके फिरते हैं, क्योंकि उनकी धोकेबाज़ी फ़रेब ही है।
119तू ज़मीन के तमाम बेदीनों को नापाक चाँदी से ख़ारिज की हुई मैल की तरह फेंककर नेस्त कर देता है, इसलिए तेरे फ़रमान मुझे प्यारे हैं।
120मेरा जिस्म तुझसे दहशत खाकर थरथराता है, और मैं तेरे फ़ैसलों से डरता हूँ।


